आंगनबाड़ी से स्कूल तक अब मुस्कुराता सफर: ‘बाल मैत्री’ से बच्चों का डर हुआ दूर, दोस्ती के साथ बढ़ा आत्मविश्वास

आंगनबाड़ी से स्कूल तक अब मुस्कुराता सफर: ‘बाल मैत्री’ से बच्चों का डर हुआ दूर, दोस्ती के साथ बढ़ा आत्मविश्वास
आंगनबाड़ी से स्कूल तक अब मुस्कुराता सफर: ‘बाल मैत्री’ से बच्चों का डर हुआ दूर, दोस्ती के साथ बढ़ा आत्मविश्वास

रायपुर, 22 मार्च 2026।छोटे-छोटे कदम, बड़े बदलाव की ओर… छत्तीसगढ़ में बच्चों के भविष्य को संवारने की दिशा में “बाल मैत्री ” पहल एक संवेदनशील और असरदार कदम बनकर उभरी है। अब आंगनबाड़ी से स्कूल तक का सफर बच्चों के लिए डर और संकोच का नहीं, बल्कि दोस्ती, उत्साह और आत्मविश्वास का अनुभव बनता जा रहा है।महिला एवं बाल विकास विभाग और स्कूल शिक्षा विभाग के संयुक्त प्रयास से शुरू हुई यह पहल बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी मजबूत बनाने पर केंद्रित है। जीवन के पहले छह वर्ष, जो बच्चों के मानसिक और व्यक्तित्व विकास की नींव होते हैं, उसी दौर में यह कार्यक्रम उन्हें सहजता से विद्यालयी वातावरण से जोड़ रहा है।पहले जहां आंगनबाड़ी से सीधे स्कूल पहुंचने पर बच्चे घबराहट और झिझक महसूस करते थे, वहीं अब “बाल मैत्री” कार्यक्रम उस दूरी को पाट रहा है। 4 से 6 वर्ष के बच्चों को हर माह नजदीकी प्राथमिक विद्यालयों का भ्रमण कराया जा रहा है। इस दौरान खेल, गीत, चित्रकला और सामूहिक गतिविधियों के जरिए बच्चों को स्कूल से परिचित कराया जाता है। शिक्षक और बड़े बच्चे उनका आत्मीय स्वागत करते हैं, जिससे स्कूल अब उन्हें अनजाना नहीं, अपना सा लगने लगा है।20 मार्च को पूरे प्रदेश में एक साथ आयोजित विद्यालय भ्रमण ने इस पहल को उत्सव जैसा रूप दे दिया। स्कूलों में बच्चों की खिलखिलाहट गूंजी, नए दोस्त बने और सीखने की शुरुआत मुस्कान के साथ हुई। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर बच्चों के लिए ऐसा माहौल तैयार करते नजर आए, जहां पढ़ाई बोझ नहीं, एक आनंदमय अनुभव बन जाए। दरअसल यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य सचिव सम्मेलन में दिए गए उस विजन से प्रेरित है, जिसमें आंगनबाड़ी और स्कूलों के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया गया था। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे गंभीरता से लागू करते हुए दोनों विभागों के बीच मजबूत तालमेल स्थापित किया है। कुलमिलाकर बाल मैत्री अब केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव बनता दिख रहा है। यह पहल न सिर्फ बच्चों के मन से स्कूल का डर मिटा रही है, बल्कि उन्हें आत्मविश्वासी, सामाजिक और सीखने के लिए उत्सुक बना रही है।आने वाले समय में यह प्रयास न केवल बच्चों की उपस्थिति और सीखने की गुणवत्ता बढ़ाएगा, बल्कि छत्तीसगढ़ को बाल-अनुकूल शिक्षा के क्षेत्र में एक मिसाल के रूप में भी स्थापित करेगा।