किताबें छोड़ कटोरा थामे सड़कों पर नन्हे मासूम,सूरजपुर की सड़कों पर भिक्षावृत्ति की कड़वी हकीकत, बाल संरक्षण तंत्र पर सवालों की बौछार

किताबें छोड़ कटोरा थामे सड़कों पर नन्हे मासूम,सूरजपुर की सड़कों पर भिक्षावृत्ति की कड़वी हकीकत, बाल संरक्षण तंत्र पर सवालों की बौछार
किताबें छोड़ कटोरा थामे सड़कों पर नन्हे मासूम,सूरजपुर की सड़कों पर भिक्षावृत्ति की कड़वी हकीकत, बाल संरक्षण तंत्र पर सवालों की बौछार

सूरजपुर।बाल दिवस पर स्कूलों और संस्थानों में रंग-बिरंगी प्रस्तुतियों, सेल्फियों और समारोहों की रौनक के बीच शहर की सड़कों पर एक दर्दनाक हकीकत खुलेआम मुंह चिढ़ा रही है। चौक-चौराहों पर फटे कपड़ों में भीख मांगते नन्हे बच्चे और गोद में शिशुओं को लिए भटकती महिलाएं—यह दृश्य बताता है कि बाल संरक्षण व्यवस्था कितनी खोखली हो चुकी है।एसी दफ्तरों में योजनाओं की फाइलें घूमती हैं, मगर ये मासूम अभी भी पेट भरने के लिए कटोरा उठाने को मजबूर हैं। कुलमिलाकर सूरजपुर की सड़कें सिस्टम की असल तस्वीर सामने रख रही हैं।बाल दिवस की चमक-दमक के पीछे छिपी यह भयावह सच्चाई कब खत्म होगी..?जवाब अभी तक किसी के पास नहीं…

मजबूरी की मार: गरीबी और उपेक्षा ने धकेला भीख की ओर

हमारी टीम ने बिना कैमरे के बच्चों और महिलाओं से बात की। कैमरा देखते ही चेहरा फेर लेने वाले इन चेहरों ने आखिर सच बताया—एक महिला बोली, 100–200 रुपये मिल जाते हैं, बस इसी से घर चलता है।बच्चों ने बताया कि उनके पास न स्कूल की फीस है, न कॉपी-किताब। काम ढूंढने जाते हैं तो उम्र देख भगा दिया जाता है।ज्यादातर बच्चे भैयाथान क्षेत्र के समोली गांव के बसोर समुदाय के हैं—कभी बांस कारीगरी से रोजी-रोटी चलती थी, लेकिन प्लास्टिक और मशीनों ने रोजगार छीन लिया। सरकारी योजनाएं नहीं पहुँचीं, और सामाजिक उपेक्षा ने इन परिवारों को भिक्षावृत्ति की ओर धकेल दिया।

ICPS का फंड हर साल, लेकिन परिणाम कागजी खानापूर्ति 

जिले में ICPS के तहत बाल सुरक्षा, रेस्क्यू व पुनर्वास के लिए हर साल भारी-भरकम बजट आता है, मगर धरातल पर न रेस्क्यू, न FIR, न पुनर्वास सुविधाएं।जो थोड़ी बहुत होती है वह दिखावे और कागजी खानापूर्ति को पूरा करने भर तक सीमटी हुई है।खबसे अहम विषय यह भी है कि वर्षों से एक ही कुर्सी पर टिके अधिकारी, राजनीतिक संरक्षण की आड़ में अपनी डफ़ली अपना राग अलापते हुए खुद को सक्रिय बताने की होड़ में शामिल हैं लेकिन हकीकत में पूरा बाल संरक्षण तंत्र पंगु नजर आ रहा है।इसका उदाहरण पूर्व में प्रेमनगर क्षेत्र में धनुहार जनजाति के बच्चों को तस्करी से बचाया गया था, लेकिन तस्करों पर FIR तक दर्ज नहीं हुई,आज भी वे खुलेआम बच्चों को झांसा देते घूम रहे हैं।

हमर उत्थान सेवा समिति की हुंकार—उच्चस्तरीय जांच जरूरी

समिति अध्यक्ष चंद्र प्रकाश साहू ने कड़ी आपत्ति जताई: “बाल दिवस तब सार्थक जब हर बच्चे को शिक्षा-सुरक्षा मिले।” मांगें—तत्काल रेस्क्यू अभियान, जेजे एक्ट में FIR, अधिकारी की जांच, जमे अफसरों का ट्रांसफर।