हवाई पट्टी पर उड़ान से पहले उठे भ्रष्टाचार के साए, 2.34 करोड़ के भुगतान पर घिरा जीर्णोद्धार कार्य

हवाई पट्टी पर उड़ान से पहले उठे भ्रष्टाचार के साए, 2.34 करोड़ के भुगतान पर घिरा जीर्णोद्धार कार्य

15 दिन में जांच का था आदेश, करीब दो महीने बाद भी रिपोर्ट गायब... सवालों के घेरे में विभागीय कार्यप्रणाली

बलरामपुर। तामेश्वर नगर की हवाई पट्टी का जीर्णोद्धार क्षेत्र के विकास और बेहतर हवाई संपर्क की उम्मीद लेकर शुरू हुआ था, लेकिन अब यही परियोजना कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के कारण चर्चा के केंद्र में आ गई है। करोड़ों रुपये की लागत वाले इस कार्य में भुगतान और निर्माण की वास्तविक स्थिति को लेकर उठे सवालों ने न केवल लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।सूचना के अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ता डॉ. डी.के सोनी ने आरोप लगाया है कि तामेश्वर नगर हवाई पट्टी के जीर्णोद्धार कार्य में फर्जी माप पुस्तिका (एमबी), फर्जी बिल-वाउचर तथा दस्तावेजों में कथित कूटरचना कर शासकीय राशि का गबन किया गया है। उनका दावा है कि इस पूरे मामले में विभागीय अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत से करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया।जानकारी के अनुसार, इस कार्य को 28 जून 2024 को तकनीकी स्वीकृति मिली थी। इसके बाद 17 जनवरी 2025 को लगभग 3 करोड़ 67 लाख रुपये की लागत का कार्यादेश जारी किया गया। अनुबंध के मुताबिक चार माह के भीतर निर्माण पूरा होना था, लेकिन तय समय बीत जाने के बाद भी कार्य पूर्ण नहीं हो सका।डॉ. सोनी का आरोप है कि निर्माण कार्य अधूरा होने के बावजूद विभाग ने ठेकेदार को करीब 2 करोड़ 34 लाख रुपये का भुगतान कर दिया। उनका कहना है कि यदि मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन कराया जाए तो भुगतान के अनुरूप कार्य दिखाई नहीं देता। उनका आरोप है कि कागजों में कार्य को बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाते हुए भुगतान निकाला गया।इसी मामले को लेकर डॉ. सोनी ने 12 मई 2026 को सरगुजा संभागीय आयुक्त से शिकायत की थी। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए 19 मई 2026 को संभागीय आयुक्त ने लोक निर्माण विभाग के संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को 15 दिनों के भीतर जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।हालांकि, शिकायतकर्ता का कहना है कि आदेश जारी होने के करीब दो महीने बाद भी न तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई और न ही उन्हें जांच प्रक्रिया से अवगत कराया गया। इससे जांच की निष्पक्षता और गंभीरता पर सवाल उठ रहे हैं। उनका आरोप है कि मामले को जानबूझकर लंबित रखकर संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार को बचाने की कोशिश की जा रही है।डॉ. सोनी ने यह भी कहा कि यदि समयबद्ध और निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई तो वे मुख्य अभियंता सहित संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध न्यायालय की शरण लेंगे। उनका आरोप है कि उच्च स्तर के संरक्षण के कारण भ्रष्टाचार के मामलों में प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती, जिससे दोषियों का मनोबल बढ़ता है।अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब संभागीय आयुक्त ने 15 दिनों में जांच पूरी करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे, तो आखिर करीब दो महीने बाद भी जांच रिपोर्ट सामने क्यों नहीं आई? यदि जांच पूरी हो चुकी है तो उसे सार्वजनिक करने में देरी किस वजह से हो रही है? इन सवालों के जवाब का इंतजार केवल शिकायतकर्ता ही नहीं, बल्कि आम जनता भी कर रही है, क्योंकि सार्वजनिक धन से जुड़े हर कार्य में पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी होती है।