संजय वन वाटिका में कुत्तों का खूनी हमला: 15 हिरणों की मौत, छोटे कर्मचारी सस्पेंड… बड़े अफसरों पर क्यों नहीं कार्रवाई...?

संजय वन वाटिका में कुत्तों का खूनी हमला: 15 हिरणों की मौत, छोटे कर्मचारी सस्पेंड… बड़े अफसरों पर क्यों नहीं कार्रवाई...?

अम्बिकापुर। शहर के संजय वन वाटिका (संजय पार्क) में हुई घटना ने संवेदनशील लोगों को भीतर तक झकझोर दिया है। जिन हिरणों को संरक्षण देने के लिए बाड़ों में रखा गया था, वही बाड़े उनकी कब्रगाह बन गए। रात के सन्नाटे में आवारा कुत्तों का झुंड अंदर घुसा और बेबस वन्यजीवों को नोच-नोचकर मार डाला।संजय वन वाटिका की यह घटना सिर्फ 15 हिरणों की मौत नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान है। अब देखना होगा कि जांच का दायरा केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित रहता है या फिर जवाबदेही की आंच बड़े अधिकारियों तक भी पहुंचती है। उक्ताशय पर जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, 21 मार्च की सुबह करीब 8:30 बजे सूचना मिली कि रात 3:00 से 3:30 बजे के बीच आवारा कुत्तों ने हिरण बाड़े में घुसकर हमला कर दिया। कुत्ते फेंसिंग के नीचे से अंदर घुसे और हिरणों को दौड़ाकर बुरी तरह घायल कर दिया। इस हमले में 6 कोटरा, 6 चीतल और 2 चौसिंघा सहित 14 हिरणों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक घायल चीतल ने 22 मार्च की सुबह दम तोड़ दिया।मौके पर पहुंचे अधिकारियों ने देखा कि हर हिरण के शरीर पर संघर्ष के गहरे निशान थे कहीं गर्दन पर दांतों के घाव, तो कहीं पीछे के हिस्से पर नोचने के जख्म। यह दृश्य सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि बेबस जानवरों की आखिरी जंग की मूक गवाही दे रहा था।

जिम्मेदारी तय या सिर्फ औपचारिकता..?

जांच प्रतिवेदन में रात्रि ड्यूटी पर तैनात चौकीदारों और कर्मचारियों की लापरवाही सामने आने पर विभाग ने उप वनक्षेत्रपाल, वनपालों और वनरक्षक सहित कई कर्मचारियों को निलंबित कर दिया।लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है क्या इतने बड़े हादसे की जिम्मेदारी केवल निचले कर्मचारियों पर डालकर मामला खत्म कर दिया जाएगा..?

सुरक्षा पर खर्च, फिर भी असुरक्षित वन्यजीव

स्थानीय लोगों के अनुसार,संजय वन वाटिका की सुरक्षा व्यवस्था पर हर साल लाखों रुपये खर्च होते हैं,पार्क शहर के बीच स्थित है साथ ही साथ पास में ही वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के आवास भी हैं।इसके बावजूद यदि आवारा कुत्ते बाड़ा तोड़कर अंदर घुस जाएं और 15 वन्यजीवों को मार दें, तो यह केवल चूक नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता मानी जा रही है।

 चुप्पी क्यों, जब सवाल बड़े हैं..?

घटना के बाद कार्रवाई व घटना से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक तो हुई, लेकिन मामले में केवल छोटे कर्मचारीयों पर कार्यवाही और बड़े अधिकारियों की जवाबदेही पर कोई स्पष्टता नहीं होने से जनचर्चाओं में अब यही सवाल गूंज रहा है क्या जिम्मेदारी तय करने का दायरा ऊपर तक जाएगा या फिर हर बार की तरह नीचे ही रुक जाएगा..?

एक दर्दनाक सच्चाई

यह घटना केवल आंकड़ों में दर्ज 15 मौतें नहीं है, बल्कि उन मासूम जीवों की पीड़ा है, जो सुरक्षा के नाम पर बनाए गए दायरे में ही असुरक्षित साबित हुए। कुलमिलाकर संजय वन वाटिका की यह घटना प्रशासन और वन विभाग दोनों के लिए चेतावनी है। यदि अब भी जिम्मेदारी तय करने में पारदर्शिता नहीं लाई गई, तो ऐसे हादसे भविष्य में और भी बड़े सवाल खड़े करेंगे।