भटगांव में यूनियन सदस्यता सत्यापन: इस बार सिर्फ सदस्यता नहीं, भरोसे की भी परीक्षा

भटगांव में यूनियन सदस्यता सत्यापन: इस बार सिर्फ सदस्यता नहीं, भरोसे की भी परीक्षा

7, 8 और 15 सितंबर को होगा सत्यापन, खदानों में पसीना बहाने वाले कामगार तय करेंगे अपनी आवाज का साथी

सूरजपुर। सुबह की पहली किरण के साथ जब खदान की ओर जाने वाली बसें निकलती हैं, तब उनमें बैठे कर्मचारियों के मन में रोज की तरह कई सवाल होते हैं। काम सुरक्षित रहेगा या नहीं, बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी, वेतन से जुड़ी परेशानी कब दूर होगी और जरूरत पड़ने पर उनकी आवाज कौन उठाएगा। यही सवाल अब एसईसीएल भटगांव क्षेत्र में होने वाले यूनियन सदस्यता सत्यापन के दौरान भी दिखाई दे रहे हैं।7, 8 और 15 सितंबर को होने वाली सदस्यता सत्यापन प्रक्रिया ने श्रमिक संगठनों की सक्रियता बढ़ा दी है। लेकिन कर्मचारियों के लिए यह केवल किसी यूनियन को चुनने का अवसर नहीं है। यह उस संगठन पर भरोसा जताने का फैसला है, जिसे वे अपने सुख-दुख और अधिकारों की लड़ाई में अपने साथ खड़ा देखना चाहते हैं।

मजदूर के लिए यूनियन का मतलब सिर्फ झंडा नहीं

खदान में काम करने वाले कर्मचारी की जिंदगी कड़ी मेहनत से गुजरती है। घंटों काम करने के बाद जब वह घर लौटता है तो परिवार उसकी राह देख रहा होता है। उसके लिए वेतन की एक छोटी सी विसंगति भी महीने का बजट बिगाड़ सकती है और पदोन्नति में देरी बच्चों की जरूरतों पर असर डाल सकती है।सबसे बड़ी चिंता सुरक्षा की होती है। क्योंकि हर सुबह काम पर जाते समय परिवार की नजर दरवाजे पर टिकी रहती है कि शाम को घर का सदस्य सुरक्षित लौट आए।ऐसे में यूनियन कर्मचारी के लिए केवल संगठन नहीं, बल्कि जरूरत के समय अपनी बात कहने का माध्यम बन जाती है।

एचएमएस का जोर सीधे संपर्क पर

सत्यापन की तारीख करीब आने के साथ हिंद मजदूर सभा (एचएमएस) के पदाधिकारी और कार्यकर्ता कर्मचारियों के बीच पहुंच रहे हैं। खदानों, वर्कशॉप और हाजिरी चौकियों पर बातचीत का दौर चल रहा है।एचएमएस अपने जमीनी संपर्क और पिछले कार्यकाल में कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों को उठाने को अपनी ताकत बता रहा है। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि वेतन विसंगति, सुरक्षा, पदोन्नति और कर्मचारी कल्याण जैसे मुद्दे उनके लिए प्राथमिकता रहे हैं।संगठन का दावा है कि लंबे समय से कर्मचारियों के बीच बने सीधे संपर्क और समस्याओं को लेकर सक्रियता के कारण उसे इस बार भी समर्थन मिलने की उम्मीद है।

किसने मुश्किल वक्त में साथ दिया, यही याद रहता है

यूनियन सदस्यता को लेकर कर्मचारियों के बीच चर्चाएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन एक बात लगभग हर कामगार के लिए महत्वपूर्ण है, मुश्किल समय में कौन उसके साथ खड़ा हुआ।जब किसी कर्मचारी को अपनी समस्या लेकर दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जब किसी सुविधा के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है या जब काम के दौरान सुरक्षा को लेकर सवाल उठता है, तब भाषण और नारे पीछे छूट जाते हैं। उस वक्त साथ खड़ा व्यक्ति और संगठन ही याद रहता है।एचएमएस इसी भरोसे को अपनी सबसे बड़ी पूंजी मान रहा है।

फैसला मतपत्र से ज्यादा मन का होगा

7 और 8 सितंबर के बाद 15 सितंबर को होने वाले अंतिम चरण में तस्वीर साफ होगी। किस संगठन की कितनी पकड़ है, इसका फैसला कर्मचारियों की सदस्यता से सामने आएगा।लेकिन इस पूरी प्रक्रिया की असली कहानी संख्या से कहीं बड़ी है। यह उन श्रमिकों की कहानी है जो रोज धरती की गहराई में उतरकर देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अपना योगदान देते हैं। उनके हाथों पर लगी कोयले की कालिख सिर्फ काम का निशान नहीं, बल्कि उनके परिवारों की उम्मीदों का हिस्सा है।अब इन्हीं हाथों को तय करना है कि उनकी आवाज किस संगठन के साथ आगे जाएगी।एचएमएस अपनी मजबूत पकड़ और कर्मचारियों के भरोसे के आधार पर एक बार फिर बढ़त की उम्मीद कर रहा है। अंतिम फैसला हालांकि कर्मचारी ही करेंगे। 15 सितंबर को जब तस्वीर सामने आएगी, तब यह सिर्फ किसी यूनियन की जीत या हार नहीं होगी, बल्कि यह भी सामने आएगा कि भटगांव के कामगारों ने इस बार अपने भरोसे की जिम्मेदारी किसे सौंपी है।