मयूरधक्की में हाथी का खौफ, दो घरों को नुकसान; ग्रामीणों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
सूरजपुर। रात का सन्नाटा अचानक हाथी की आहट और घर टूटने की आवाज से दहशत में बदल गया। सूरजपुर वन मंडल क्षेत्र के मयूरधक्की गांव में बीती मध्य रात्रि हाथी के दो ग्रामीण भाइयों के मकानों को नुकसान पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। घटना में भवन के साथ भीतर रखा सामान भी क्षतिग्रस्त होने की जानकारी सामने आई है।ग्रामीणों के मुताबिक, गांव निवासी रामकिशून और राम प्रसाद के घरों के पास रात में एक हाथी पहुंचा। देखते ही देखते उसने मकानों को नुकसान पहुंचाया। इस दौरान परिवार के लोगों में अफरा-तफरी मच गई। सुबह जब ग्रामीणों ने घर की हालत देखी तो बिखरा सामान और क्षतिग्रस्त हिस्सा इस रात की भयावहता बयां कर रहा था। घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है।इस घटना के बाद मयूरधक्की में डर साफ महसूस किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों की आवाजाही पहले भी परेशानी का कारण बन चुकी है। एक ग्रामीण ने फोन पर बातचीत में बताया कि ताजा घटना के बाद भी समाचार तैयार किए जाने तक वन विभाग का कोई जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचा।ग्रामीणों ने यह भी दावा किया कि पूर्व में इसी गांव में हाथी ने एक अन्य मकान को नुकसान पहुंचाया था। उनका आरोप है कि उस समय भी प्रभावित परिवार तक विभागीय अमला समय पर नहीं पहुंच सका।
सवाल सिर्फ टूटे मकानों का नहीं
हाथी के गांव में पहुंचने की घटनाएं अब केवल डर पैदा करने तक सीमित नहीं रह गई हैं। जब जंगल और बस्ती की दूरी घटती है तो सबसे पहले उसकी कीमत उन परिवारों को चुकानी पड़ती है, जिनके लिए मिट्टी, लकड़ी और टीन से बना घर ही पूरी दुनिया होता है। एक रात में सामान उजड़ना और सुबह उसी घर के सामने खड़े होकर नुकसान देखना किसी भी परिवार के लिए आसान नहीं होता।
ऐसे में ग्रामीण पूछ रहे हैं कि हाथियों की निगरानी के लिए जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी व्यवस्था है? क्या संवेदनशील गांवों तक समय रहते सूचना पहुंच रही है? यदि हाथियों की मौजूदगी पहले से पता चल जाती है तो ग्रामीणों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की व्यवस्था क्यों नहीं हो पा रही?
इसके साथ ही लगातार घटते जंगल और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी चिंता बढ़ रही है। जंगल हाथियों का घर है, लेकिन जब वही क्षेत्र सिकुड़ता है तो भोजन और पानी की तलाश उन्हें बस्तियों की ओर खींच लाती है। ऐसे में संरक्षण की योजनाएं कागज से निकलकर जमीन पर कितनी असरदार साबित हो रही हैं, यह भी जांच का विषय है।
मयूरधक्की की घटना की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हो सकी है। वन विभाग के उपलब्ध कुछ संपर्क नंबरों पर जानकारी लेने का प्रयास किया गया, लेकिन खबर तैयार होने तक संपर्क नहीं हो पाया।
अब प्रभावित परिवारों की नजर प्रशासन पर है। ग्रामीण चाहते हैं कि मौके पर पहुंचकर नुकसान का वास्तविक आकलन किया जाए, पात्र परिवारों को नियमानुसार सहायता मिले और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए ठोस व्यवस्था बनाई जाए।
क्योंकि यहां बात सिर्फ दो मकानों की दीवारों के टूटने की नहीं है। सवाल उस भरोसे का भी है, जिसके सहारे जंगल की सीमा से सटे गांवों में रहने वाले लोग हर रात अपने घरों के दरवाजे बंद करते हैं और उम्मीद करते हैं कि सुबह सब कुछ सुरक्षित मिलेगा।