मिट्टी व गिट्टी के ढेर में दफ्न हो गया एक और सपना: केतका परसपारा में मिट्टी धंसने से मजदूर की दर्दनाक मौत,अवैध खनन पर चुप्पी

मिट्टी व गिट्टी के ढेर में दफ्न हो गया एक और सपना: केतका परसपारा में मिट्टी धंसने से मजदूर की दर्दनाक मौत,अवैध खनन पर चुप्पी

सूरजपुर । जिले की धरती एक बार फिर लाल हुई है। ग्राम केतका परसपारा स्थित अवैध गिट्टी खदान में मंगलवार को मिट्टी धंसने से देवशंकर सिंह की दर्दनाक मौत हो गई। वह सिर्फ एक मजदूर नहीं था, बल्कि अपने परिवार का सहारा, बच्चों का भविष्य और माता-पिता की उम्मीद था।मिट्टी व गिट्टी के ढेर के नीचे दबा उसका शरीर मानो व्यवस्था से यह सवाल पूछ रहा है-क्या गरीब की जान इतनी सस्ती है..?

मंगलवार की मजदूरी बनी आखिरी सफर

मिली जानकारी अनुसार ग्राम केतका कोलढोडहीपारा निवासी देवशंकर सिंह सुबह अपने साथियों जंगसाय राउत और बालकेश्वर राउत के साथ गिट्टी तोड़ने खदान पहुंचा था। रोज की तरह हथौड़ा चला ही रहा था कि दोपहर करीब दो बजे अचानक मिट्टी का बड़ा हिस्सा भरभराकर गिर पड़ा।कुछ ही पलों में सब खत्म हो गया। साथियों ने जान की बाजी लगाकर उसे बाहर निकाला, लेकिन तब तक सांसें थम चुकी थीं।सूचना मिलते ही परिजन मौके पर पहुंचे-मां की चीख, पत्नी की सिसकियां और बच्चों की मासूम नजरें पूरे गांव को झकझोर गईं। पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है और एसडीएम को सूचना दे दी गई है, लेकिन क्या इससे परिवार का उजड़ा आंगन फिर बस पाएगा..?

मजबूरी की मजदूरी, मौत का सौदा

इस घटनाक्रम पर ग्रामीणों का दर्द साफ है-गांव में रोजगार के अवसर नहीं। दिहाड़ी की तलाश में मजदूरों को अवैध खदानों में उतरना पड़ता है। वहां न सुरक्षा के इंतजाम, न निगरानी। मिट्टी कब धंस जाए, कोई भरोसा नहीं, इससे पहले भी हादसे हों चुके हैं उसी क्रम में एक और हादसे का शिकार देवशंकर सिंह भी रोज की तरह कुछ सौ रुपये कमाने गया था, ताकि चूल्हा जल सके। लेकिन यह मजदूरी उसकी जिंदगी पर भारी पड़ गई।

माफिया कमाते रहे, मजदूर मरते रहे

जिले में गिट्टी, रेत और अन्य खनिजों का अवैध उत्खनन कोई छिपी बात नहीं है। खुलेआम ट्रैक्टर-ट्रॉलियां सहित अन्य माल वाहक वाहनों के माध्यम से धड़ल्ले से सामग्री बाजार तक पहुंचती है। मजदूरों को मिलते हैं चंद रुपये, जबकि बाजार में वही गिट्टी सहित अन्य खनिज मोटे दामों में बिकती है। कुलमिलाकर यह घटनाक्रम सवाल खड़े कर रहा है कि जब अवैध खदानें सबको दिखती हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं दिखती..?ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि खनन माफियाओं और जिम्मेदार तंत्र के बीच कथित सांठगांठ के कारण कार्रवाई की धार कुंद हो जाती है। हादसे के बाद दो दिन हलचल, फिर सन्नाटा।

नारे बनाम हकीकत

सबका साथ, सबका विकास के दावे मंचों से गूंजते हैं, योजनाओं के पोस्टर लगते हैं, लेकिन अंतिम पंक्ति में खड़े इन परिवारों तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाती।जब तक गांवों में स्थायी रोजगार के साधन नहीं बनेंगे, तब तक गरीब मजदूर मौत की इन खदानों में उतरने को मजबूर रहेंगे।देवशंकर सिंह की मौत एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सिस्टम पर करारा सवाल है।क्या प्रशासन अब जागेगा..?क्या माफियाओं पर सख्त कार्रवाई होगी..?या फिर यह हादसा भी कुछ दिनों की सुर्खियों के बाद फाइलों में दफ्न हो जाएगा..?सवाल हवा में तैर रहे हैं… और एक परिवार का चूल्हा हमेशा के लिए ठंडा हो चुका है।